महात्मा आर्य भिक्षु – सन्यास के बाद स्वामी आत्म बोध सरस्वती
आर्य समाज के पूर्ण समर्पित एवंम कर्मठ सेवा करने वाले वैदिक विद्वान् थे।
वे आर्य समाज के महान ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश जो स्वामी दयानन्द सरवती द्वारा रचित है, पढ़ कर अत्यंत प्रभावित हुए समाज के सिद्धांतो को मानने के लिए दृढ प्रतिज्ञा ली।
मुग़ल सराय में वर्षो तक आर्य समाज के प्रधान पद पर रहे। आर्य समाज की सर्वोच्च संस्था सार्वदेशिक सभा के उप-प्रधान पद को वर्षो तक सुशोभित किया। आर्य वीर दाल के कईं वर्षो तक संचालक भी रहे। बाद में श्री नारायण द्वारा स्थापित आर्य विरक्त (वानप्रस्थ एवंम सन्यास) आश्रम वानप्रस्थी एवंम सन्यास आश्रमों की दीक्षा ली।
समयानुसार आर्य समाज के सिद्दांतो के अनुसार दीक्षा लेकर आर्य वानप्रस्थ आश्रम ज्वालापुर हरिद्वार में रहे।
इस दौरान आर्य वानप्रस्थ आश्रम के प्रधान पद पर वर्षो कार्यरत रहे और आर्य सिद्धांतो के प्रचार व् प्रसार के लिए अपना सर्वस्व निछावर किया।
अपने कार्यकाल में उन्हें उपदेशक के रूप में जो भी दान प्राप्त हुआ उन्होंने आर्य समाज की विभिन्न संस्थाओ का गठन करवा के दान किया ताकि उनके पैसे का सदुपयोग हो।
अपने कार्यकाल में आर्य समाज के विभिन्न न्यासों (मोहन वैदिक आश्रम, गुरुकुल आश्रम लखनऊ एवंम स्वामी दयानन्द के जन्म स्थान टंकारा न्यास) से जुड़े रहे। गुरुकुल महाविद्यालय अयोध्या के कुलपति पद को सुशोभित किया। वे आर्य समाज के प्रखर प्रवक्ता थे।