Arya Samaj Haridwar – Dedicated to Vedic Culture & Arya Samaj Activites Worldwide

स्वामी दयानंद सरस्वती जी

जन्म: 1824 | मृत्यु: 1883

उपलब्धियाँ: आर्य समाज की स्थापना की और वैदिक शिक्षा प्रदान करने के लिए गुरुकुल स्थापित किए। दयानंद सरस्वती भारत के इतिहास के सबसे क्रांतिकारी सामाजिक-धार्मिक सुधारकों में से एक थे। स्वामी दयानंद सरस्वती आर्य समाज के संस्थापक थे और उन्होंने उस समय वेदों के समतावादी दृष्टिकोण का प्रचार किया जब समाज में व्यापक जातिवाद व्याप्त था।

स्वामी दयानंद सरस्वती का मूल नाम मूलशंकर तिवारी था। उनका जन्म 1824 में गुजरात के टंकारा में एक धनी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन में दयानंद का पालन-पोषण अत्यंत कठोर ब्राह्मण शासन में हुआ और आठ वर्ष की आयु में उनका उपनयन संस्कार किया गया।

जब वे चौदह वर्ष के थे, तब उनके पिता उन्हें शिवरात्रि के अवसर पर मंदिर ले गए। दयानंद को भगवान शिव की आज्ञा का पालन करने के लिए पूरी रात उपवास और जागरण करना पड़ा। रात में उन्होंने देखा कि एक चूहा भगवान को अर्पित भोग कुतर रहा है और शिव के शरीर पर दौड़ रहा है। उन्होंने अपने बड़ों से यह जानने की कोशिश की कि यह “सर्वशक्तिमान ईश्वर” एक तुच्छ चूहे के आतंक से अपनी रक्षा क्यों नहीं कर सका, जिसके लिए उन्हें फटकार भी मिली। इस घटना ने दयानंद सरस्वती की मूर्ति पूजा में आस्था को तोड़ दिया और उसके बाद उन्होंने जीवन भर धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने से इनकार कर दिया।

उन्नीस वर्ष की आयु में दयानंद सरस्वती एक जबरन विवाह से बचने के लिए घर से भाग गए। उन्हें पकड़ लिया गया और कैद कर लिया गया। 1845 में वे फिर से भाग गए। पंद्रह वर्षों तक वे गुरु की खोज में पूरे देश में भटकते रहे। 1860 में, उन्हें मथुरा में अपने गुरु और मार्गदर्शक स्वामी विरजानंद सरस्वती मिले, वे अंधे थे।

महात्मा आर्य भिक्षु

संस्थापक आर्य समाज हरिद्वार

महात्मा आर्य भिक्षु – सन्यास के बाद स्वामी आत्म बोध सरस्वती।आर्य समाज के पूर्ण समर्पित एवंम कर्मठ सेवा करने वाले वैदिक विद्वान् थे। वे आर्य समाज के महान ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश जो स्वामी दयानन्द सरवती द्वारा रचित है, पढ़ कर अत्यंत प्रभावित हुए समाज के सिद्धांतो को मानने के लिए दृढ प्रतिज्ञा ली। मुग़ल सराय में वर्षो तक आर्य समाज के प्रधान पद पर रहे।  

संरक्षक आर्य समाज हरिद्वार

डॉ रामकृष्ण आचार्य, एक प्रख्यात वैदिक प्रवक्ता, विभिन्न गुरुकुल आश्रमों के संस्थापक एवंम आर्य समाजो के संस्थापक है।

उनके द्वारा स्थापित गुरुकुल आश्रम उच्चतर माध्यमिक संस्कृत विद्यालय लखनऊ एवंम संस्कृत वैदिक आश्रम संस्कृत पाठशाला प्रमुख है।

वर्ष 1970  में उन्हें डॉक्ट्रेट की उपाधि संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी ने प्रदान किया। 

मंत्री / पुरोहित
आर्य समाज हरिद्वार

उमाकांत शुक्ल जी शास्त्री की उपाधि प्राप्त एवंम वेद विषय पर डॉक्ट्रेट रहे है व वैदिक कर्म काण्ड के प्रकांड विद्वान एवंम कर्म कांडी है।
पिछले 5 वर्षो से अधिक समय से सभी तरह के संस्कार व पूजा पाठ के पुरोहित है।

आर्य समाज के उद्देश्य

संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्या उद्देश्य है अर्थात शारीरिक, आत्मिक एवंम समाज की उन्नति करना। इस कार्य हेतु आर्य समाज हरिद्वार के निम्न उद्देश्य निश्चित किये गए है
  • वैदिक धर्म के प्रचार को बढ़ावा देना।
  • समाज का बालको एवंम नवयवको का चरित्र निर्माण करवा कर सच्चा मानव बनने में मदद करना।
  • निराश्रितों, पीड़ितों की रक्षा, सेवा और सहायता के लिए अनाथ बालक, बालिकाओं के पालन, पोषण, रक्षा तथा शिक्षा दीक्षा की निशुल्क व्यवस्था करना और आश्रमों की स्थापना अपने साधनो के अनुरूप करना।
  • वृद्धों का जीवन इस समय अत्यंत कष्टमय हो चला है उनके लिए वृद्धाश्रमों की स्थापना एवंम व्यवस्था करना।
  • देवीय आपदा तथा बाढ़, भूचाल, तूफ़ान, भूस्खलन, आदि किए कारण कही भी मानवता पीड़ित हो तो धर्म और जाती का भेद भाव किये बिना उनकी सहायता और सेवा करना।
  • निशुल्क और नाम मात्र के शुल्क वाले औषधालय चलवाना।
  • भविष्य में आर्य समाज के मंदिरों एवंम अन्य स्थानों पर स्कूल एवंम पाठशालाये खोलना।

आर्य समाज के नियम

  • सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते है, उन सब का आदि मूल परमेश्वर है।
  • ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्व्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सरष्टिकर्ता है उसी की उपासना करने योग्य है।
  • वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है।  वेद का पढ़ना – पढ़ाना और सुनना -सुनाना आर्यों  का परम धर्म है।
  • सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सदा उद्दत रहना चाहिए।
  • सब काम धर्मानुसार अर्थात सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए।
  • संसार का उपकार करना इस समाज का मुखजीअ उद्देश्य है अर्थात शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।
  • सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिए।
  • अविद्या का नाश व् विद्या की वृद्धि करना चाहिए।
  • प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिए, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।
  • सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पलने में परतंत्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतंत्र रहे।

ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।
यद् भद्रं तन्न आ सुव॥

मंत्रार्थ – हे सब सुखों के दाता ज्ञान के प्रकाशक सकल जगत के उत्पत्तिकर्ता एवं समग्र ऐश्वर्ययुक्त परमेश्वर! आप हमारे सम्पूर्ण दुर्गुणों, दुर्व्यसनों और दुखों को दूर कर दीजिए, और जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव, सुख और पदार्थ हैं, उसको हमें भलीभांति प्राप्त कराइये।

Activities Perform By Arya Samaj Haridwar

वैदिक रीति रिवाज से बताये गए सभी संस्कार के लिए पुरोहित और उपयोग में आने वाले सभी सामान उपलब्ध है। लोकाचार के अन्य यज्ञ जैसे गृह प्रवेश, जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगाँठ व काम धंधे के उद्घाटन आदि के लिए संपर्क करें।

+91-7895213126

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